किराना दुकानों का संकट- संरक्षण क्यों आवश्यक?

Posted on 19 Jul 2019

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आधुनिक युग विकल्पों का युग है। किराना सामग्री कि खरीद के लिये भी मनुष्य के पास E Commerce , सुपर बाजार व् परंपरागत किराना दुकानों के विकल्प मौजूद है। किन्तु आज भी एक आम भारतीय किराना दुकानों से ही अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरत का सामान खरीदता है | आज के बदलते परिवेश में भी किराना दुकानों का महत्व बरकरार है |

पूरे भारत में लगभग 1 करोड़ 20 लाख किराना दुकानें है| प्रत्येक किराना दुकान प्रतिदिन लगभग 100 लोगो (परिवारों) की आवश्यकताएं पूरी करती है | इन किराना दुकानों को माल निर्माता /ब्रान्ड से सुपरस्टॉकिस्ट व स्थानीय डीलर / डिस्ट्रीब्यूटर के माध्यम से प्राप्त होता है | इन्हे राष्ट्रीय/प्रादेशिक  व स्थानीय स्तर पर अलग अलग ट्रांसपोर्ट व्यापारी , मिनी वेन , लोडिंग रिक्शा , हाथ गाड़ी ,ठेला गाड़ी वाले, माल ढुलाई में सहयोग करते है | इनके अतिरिक्त उत्पाद कर्ता कंपनियों के सेल्समेन , एरिया मैनेजर , रीजनल व नेशनल मैनेजर आदि भी माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने में अपना योगदान देते है | किराना व्यापार प्रत्यक्ष  एवं अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 3 करोड़ लोगो को रोज़गार के अवसर प्रदान करता है |

 

आजकल के बड़े सुपर बाजार (जैसे की बिग बाज़ार , डी-मार्ट, मोर , मेट्रो इत्यादि) व ईकॉमर्स (जैसे फ्लिप कार्ट,अमेज़न, पेटिएम, स्नैपडील ) का बढ़ता प्रभाव और ग्राहकों का इसको बहुत तेज़ गति के साथ स्वीकार करना, किराना व्यापार को चुनौतीपूर्ण बना रहा है | हालांकि वर्तमान किराना व्यापार अत्यधिक लाभ कारी व किफायती व्यवस्था वाला है पर अभी तक भी यह व्यवस्था संगठित व आधुनिक नहीं है | इसी वजह से सुपर बाज़ार और ईकॉमर्स को अधिक कुशल और लाभकारी माना जा रहा है | इसका मूल कारण है मौजूदा परंपरागत रीटेल प्रणाली आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल लगभग नहीं के बराबर करती है | यदि किसी प्रकार मौजूदा प्रणाली तकनीकी के साथ मिल जाये तो यह एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जो की अत्यधिक फूर्ति व दक्षता के साथ काम कर सकेगी | आवश्यकता, इस चुनौती को एक सम्भावना के रूप में लेते हुए, तकनीक  आधारित एक नई स्वालम्बी व्यवस्था के निर्माण करने की है ।  

 

खुदरा बिक्री (रीटेलिंग) भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तम्भों में से एक है और भारत दुनिया के शीर्ष पांच सबसे तेज़ी से बढ़ते खुदरा बाज़ारों में से एक है | वर्तमान परिस्थितियों और चुनौतियों के बीच इस लेख के माध्यम से हम कुछ महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक बिंदुओं पर चर्चा कर रहे है जो यह बताते है की किराना दुकानों के संरक्षण की आवश्यकता क्यों है |


 

आर्थिक दृष्टिकोण

 

  1. किफायती संचालन  

 

परंपरागत रीटेल प्रणाली पिछले अनेक वर्षो (दशकों) में विकसित हुई है और सहभाजित संसाधन के सिद्धांत पर काम करती है, जबकि इसके समकक्ष, आधुनिक व्यापार एवं ई-कॉमर्स समर्पित संसाधनों के साथ काम करता है। सहभागी कार्य प्रणाली से परंपरागत व्यवसाय बहुत अधिक प्रबल और कुशल हो जाता है | आइए इसे सरल उदाहरण के साथ समझें- अगर किसी व्यवसायी को इंदौर से कोटा तक वस्तुओं को भेजना है (उदाहरण के लिए 20 बक्से), तो वह किसी सामान्य ट्रांसपोर्ट से परचून स्वरूप में अन्य कई कंपनियों के समान के साथ एक कार्टून दर या प्रति किलो के आधार पर भेज सकता है और वह भी बहुत कम आर्थिक लागत पर। इस प्रकार के 20 मझोले बक्से (कुल वजन लगभग 400 किलो ), इंदौर से कोटा लगभग रु 600 में पहुँच सकते है।  लेकिन सुपर बाज़ार या ईकॉमर्स जैसे व्यापार में कूरियर या कार्गो सुविधाओं द्वारा यही सामान पहुंचाए तो लागत बहुत अधिक होगी;  ई-कॉमर्स के मामले में, लगभग एक आइटम इंदौर से कोटा तक पहुंचने के लिए 250 ग्राम वजन के लिए लगभग  120 रुपये तक खर्च होंगे।

इससे यह स्पष्ट होता है की पारंपरिक वितरण प्रणाली अत्यधिक किफायती है। इसी प्रकार अन्य लागत जैसे गोडाउन खर्च , लोकल परिवहन लागत,स्टाफ़ खर्चे, विध्युत खर्च भी कम है | एक ही वितरक कई किराना दुकानदारों को 10-15 ब्रांड की वस्तुओं की आपूर्ति करता है। प्रारंभिक लागत और रोज़मर्रा के खर्च तक सबकुछ बहुत संतुलित है और इसलिए प्रति वस्तु लागत बहुत कम होती है|

 

 

  1. बेहतर खरीद विकल्प

यह बात एकदम सच है कि वास्तव में वस्तुओं को देखकर, छूकर खरीदने के अनुभव से बेहतर कुछ भी नहीं है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि किसी वस्तु को खरीदने के पहले उसको छूना एक अच्छा एवं व्यावहारिक अनुभव होता है। इसे वास्तव में "रीटेल थेरेपी " भी कहा जाता है और किराना दुकान इसी सिद्धांत  पर काम करती है |

 

रीटेल थेरेपी के अलावा , एक भौतिक दुकान में ख़रीददारी करने से उपभोक्ताओं को खरीदे गए स्टॉक को प्रत्यक्ष रूप से जाँचने का और गुणवत्ता जानने का अवसर मिलता  है। देख परख कर खरीदी करने के कारण वस्तु को पसंद न आने पर वापस कर देने का प्रतिशत किराना व्यापार में बहुत कम होता है, जबकि ई-कॉमर्स में यह संख्या बहुत ज़्यादा है |

 

इसी प्रकार सुपर बाजार के मामले में, आने जाने का समय , पार्किंग ढूंढने का झंझट , बाज़ार के अंदर की भीड़ , ललचाते प्रलोभनों से अनावश्यक सामान कि खरीद (पढ़े - बढ़ते खर्च ) व् बिलिंग काउंटर का लम्बा इंतज़ार हमारे खरीदी अनुभव को थोड़ा कष्टप्रद बनाता है जबकि किराना  दुकानूो के  घर के पास होने के कारण ईंधन की भी बचत होती है | पार्किंग की झंझट व बिल की लंबी कतार से भी मुक्ति मिलती है | साथ ही हमें जो आवश्यकता है हम वही माल खरीदते है ,जिससे हमारा खर्च भी नियंत्रित रहता है।

 

3. उद्यामित्ता मित्र

किराना व्यापार से उद्यमितता को मिलने वाला प्रोत्साहन किराना दुकानों को बचाने का एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है | आजकल, लोग सोचते हैं कि नए ब्रांड के साथ ऑनलाइन जाना आसान है, लेकिन यदि आप फ्लिपकार्ट जैसी किसी भी ई कॉमर्स साइट पर अपना ब्रांड स्थापित करना चाहते हैं, तो आपके पास प्रतिस्पर्धा में हजारों ब्रांड होते हैं और इसलिए आपका उत्पाद उपभोक्ता को ऑनलाइन दिखाने के लिए बहुत सारे  मार्केटिंग प्रयासों, प्रचार, डिजिटल बैनर इत्यादि की आवश्यकता होती है। इन सभी कार्यो के लिए एक विशिष्ट कौशल की आवश्यकता होती है जो सामान्यतः उपलब्ध नहीं है एवं खर्चीला भी है | इसके अलावा यदि आप बिग बाजार जैसे बड़े स्टोर के फ्रेंचाइजी को खरीदना चाहते हैं, तो आपको बड़ी मात्रा में निवेश करने की आवश्यकता होती है। यही सब कारण आधुनिक खुदरा व्यापार में प्रवेश करने के लिए बाधाओं को बढ़ाते हैं।  

 

इसके विपरीत, पारंपरिक रीटेल आपको न्यूनतम पूँजी के साथ एक दुकान शुरू करने और उद्यमी बनने के अवसर देता है। साथ ही, निर्माताओं के लिए भी, किराना दुकान में प्रवेश आधुनिक व्यापार के मुकाबले बहुत ही आसान है। उदाहरण के लिए, यदि आप अगरबत्ती का निर्माण करना शुरू करते हैं तो आस-पास के इलाकों के बाजार में आपूर्ति करना आपके लिए आसान है |  पारंपरिक किराना बाजार,  एक नई दुकान शुरू करने या एक नया डिस्ट्रीब्यूटर बनने अथवा एक नया ब्रांड स्थापित करने के लिए आसान व ज़्यादा लाभकारी व्यवस्था प्रदान करते हैं।

 

4- प्राइवेट लेबल -

यह शब्द सुनने में जितना सामान्य है,  इसका प्रभाव उतना ही खतरनाक है | आज बिग बाजार में होने वाली प्रत्येक 5 रुपये की बिक्री  में से 1 रूपए की बिक्री उसके खुद के निर्मित उत्पाद की होती है| इसे ही वह ‘प्राइवेट लेबल’  कहता हैं I  फ्लिपकार्ट, बिग बास्केट सभी बढे विक्रेताओं का  प्राइवेट लेबल पर बहुत जोर होता है| स्पष्ट है  की इन उत्पादो के सभी बिंदु जैसे गुणवत्ता,  मानक, कच्चा माल आदि पर इन बढे विक्रेताओं  पूरा नियंत्रण है|

 

अपने माल को शोरूम अथवा वेबसाइट पर कहा रखना, कब दिखाना, क्या स्किम चालाना, सभी उनके नियंत्रण में रहता हे | यह प्राइवेट लेबल हमारे लघु व् मध्यम उद्योगों को ब्राण्ड से घटाकर एक जॉब वर्कर बनाने का खतरा प्रस्तुत कर रहा है|

 

 आधुनिक रिटेलर उत्पाद भी बड़े उद्योगों से खरीदेंगे, आवश्यकता पड़ने पर दूसरे देशो से आयात करेंगे व विपणन आदि में भी स्वयं के साधन या बड़े ट्रांसपोर्टरों को प्राथमिकता देंगे | हमारा सूक्ष्म लघु उद्योग समाप्त हो जायेगा |


 

सामाजिक दृष्टिकोण


 

  1. क्या आपने कभी उद्यमियों के बिना किसी समाज की कल्पना की है?  नहीं ना । उद्यमित्ता के समाप्त होने पर कोई भी समाज विकास नहीं कर पाएगा। मनुष्य मात्र नौकरी करने पे मजबूर हो जायेंगे व नौकरियों की शर्तें और उपलब्ध्ताये कभी अनुकूल नहीं रहेगी | वही दूसरी और किराना दुकान भारत में नौकरियों और व्यवसाय दोनों  को बढ़ाकर उद्यमशीलता को जागृत रखता है। स्वयं मालिक होने से लोग अन्य को स्वरोज़गार के लिए प्रोत्साहित भी करते  है और ज़रूरतमंद लोगो को रोज़गार भी प्रदान करते हैं|                                                                                       

  2. ऊपर वर्णित प्राइवेट लेबल उत्पादों से हमें आर्थिक खतरे के आलावा बहुत अधिक सामाजिक खतरा भी है। प्राइवेट लेबल के बढ़ते चलन से एकाधिकार जैसी स्तिथि निर्मित हो जावेगी , छोटे स्थानीय उत्पाद नष्ट हो जावेंगे ,सक्षम लोग और अधिक सक्षम हो जावेंगे व् गरीब और गरीब। इससे सामाजिक खाई और गहरी हो जावेगी। सामाजिक ताने बाने पर गहरा खतरा उत्पन्न हो जावेगा।

 

  1. परंपरागत किराना व्यापार वर्षों से इतनी अच्छी तरह से विकसित हुआ है कि इसमें नियमित उपभोक्ताओं का अपना लगाव है और दुकान  मालिक द्वारा ग्राहक के पसंद और नापसंद की बेहतर समझ है| किराना दुकान अपने आस पास के सभी लोगो और परिवारों के साथ बहुत अच्छी तरह से जुड़ी हुई है। किराना  दुकान मालिक न केवल आपकी दैनिक जरूरत का प्रदायकर्ता हैं बल्कि आस-पास के परिवारों के सहयोगी के रूप में भी काम करता हैं। उदाहरण के लिए, वे आपके लिए परामर्शदाता के रूप में काम करते हैं, उधार में सामान देते हैं, वे आपकी अनुपस्थिति में आपके कूरियर आदि ले सकते हैं|  आपके घर के पास किराना दुकान वाले भैया एक पारिवारिक सदस्य की तरह बन जाते हैं। अधिकतर किराना दुकानें लोगों के लिए एक मीटिंग जंक्शन की तरह है, जहाँ पर साथ मिलकर काम करने और  मिलकर होने वाली घटनाओं पर बातचीत करने का मौका मिलता है । कुल मिलाकर, किराना दुकानें सामाजिक पर्यावरण को सुविधा-पूर्ण बनाती है।



 

अंततः

 

किराना दुकानें रोज़गार के कई अवसर प्रदान करती है, जिससे सामाजिक पर्यावरण संतुलित हो जाता है और यदि इसे कमज़ोर होने दिया जाता है तो समाज में आर्थिक असंतुलन बढ़ेगा व अशांति बन सकती है। पारंपरिक किराना दुकानें भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और इसलिए उन्हें बचाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रयास होने चाहिए -  वर्तमान व्यवस्थाओ की कमज़ोरियों की पहचान होना चाहिए व सुधार के तरीकों पर काम करके इस किराना व्यवसाय को मज़बूत व प्रतिस्पर्धी बनाना चाहिए |

 

जहाँ एक खुली अर्थव्यवस्था होने के नाते, ई-कॉमर्स व् सुपर बाजार पर  किसी भी प्रकार कि रोक टोक नहीं होना चाहिए , किन्तु वही  पर जरुरत है कि पारम्परिक व्यापार के प्रतिभागी (निर्माता , स्टॉकिस्ट व् विक्रेता ) भी इन नई चुनोतियो को समझे व् तकनीक को अपनाते हुए , यथार्थ को समझते हुए , आपसी साझेदारी से एक नई व् मजबूत व्यवस्था का निर्माण करे। समय कि मांग को देखते हुए सभी को अपनी पुरानी कमजोरियों को पहचानना चाहिए व् तात्कालिक स्वार्थ से ऊपर उठते हुए दीर्घकालीन लाभ के लिए कार्य करना चहिये। तकनीक कि उपेक्षा करने कि जगह उसे समझते हुए ,अपने विकास के लिए अपनाना चाहिए।

 

आज के बाजार में ग्राहक ही मुख्य लक्ष्य है व् परंपरागत किराना व्यापार को उसकी आवशयकताओ को समझते हुए उसे सर्वोत्तम क्रय अनुभव देने का प्रयास करना चाहिए।


 

नोट: लेखक भाग्येश द्विवेदी, परंपरागत किराना व्यापार को बढ़ाने के लिए कार्य करते है| उनसे bhagyesh@retailersapp.com  पर संपर्क किया जा सकता है |

Comments

Navin Kewale    28 May 2019

Bhagyesh, Great article. It is highlighting one of the most critical aspects of Indian economy. I see current policy direction need to be tweaked to align with what’s needed. Biggest risk is to consider is tidal wave of social unrest. Applaud your efforts!!!

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